Thursday, April 09, 2009
सबको शिक्षा से आएगा बदलाव
राज्यसभा सदस्य
जनरल इलेक्शन से अगले 5 सालों के लिए लोगों की तकदीर का फैसला होगा। और उस 5 साल की सरकार का असर सिर्फ 5 सालों तक ही नहीं होता बल्कि अगर गलत नीतियां हों तो अगले कई सालों तक हमें उसके प्रभावों के बर्दाश्त करना पड़ता है। ये हमारे देश के भविष्य का सवाल है।
पिछले 60 सालों में एक ऐसा वातावरण क्रिएट कर दिया गया है कि मुसलमान और हिंदू अलग रहें। हम एक दूसरे की परेशानियां सोचते नहीं हैं, फिक्र नहीं करते और जज्बात से सोचने की कोशिश नहीं करते कि हमारे सामने वाले के क्या इमोशंस हैं। मेरे ख्याल से चुनावों में धर्म, जाति के आधार पर वोटिंग करना सही नहीं है। ये एक चिंता का विषय है।
इंडियन डेमोक्रेसी में मुस्लिम पार्टिसिपेशन नंबर के ऐतबार से ठीक नहीं है और क्वॉलिटी के ऐतबार से तो जीरो है। सही मायने में पार्टियों ने मुस्लिम लीडरशिप को पॉलिटिकल स्पेस नहीं दिया। बल्कि उन लोगों को पॉलिटिकल स्पेस मिला जो पार्टियों के पॉलिटिकल लीडर हैं मुसलमानों के पॉलिटिकल लीडर नहीं हैं। जो जमीन से जुड़े हुए नेता थे और हैं उन्हें पार्टी ने मौका ही नहीं दिया। ऊपर पहुंचे वो जो पार्टी के नेता थे। मुसलमानों के नेता नहीं थे। उन्हीं को मौका मिल रहा है तो वो पीछे मुड़कर क्यों देखेंगे। मैं मानता हूं कि किसी नए पॉलिटिकल इस्टैबलिशमेंट की जरूरत है, पार्टी की जरूरत है। लेकिन सिर्फ इस्लाम और मुसलमान के नाम पर नहीं बल्कि जिन लोगों को न्याय नहीं मिला है वो सब एक साथ आगे बढ़ें।
अगर मुसलमान की बात करें तो उसे सिर्फ एजुकेशन की जरूरत है। अगर 20 साल का एक टारगेट मुसलमान सेट कर लें तो 20 साल में एक बदलाव आएगा, एक जनरेशन आएगी। एजुकेशन के मामले में हमने बहुत कोशिश की है। हमसे ज्यादा किसी ने नहीं की है इस देश में। हमारे 3 हजार से ज्यादा प्राइमरी स्कूल चलते हैं मदरसों के साथ। जहां मेन स्ट्रीम प्राइमरी एजुकेशन होती है। हमने लड़कियों के लिए टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज बनाया और अब आगे लड़कियों के लिए वेस्टर्न यूपी में मेडिकल यूनिवर्सिटी बनाने की सोच रहे हैं।
ये बहुत बड़ा मुल्क है तो सबसे पहले लोगों को इसके लिए तैयार करना है कि एजुकेशन की जरूरत क्यों है। हम मुसलमानों से ये कह रहे हैं कि तुम्हें बच्चों और बच्चियों को पढ़ाना है खासतौर से बच्चियों को। ये एक दिन का काम नहीं है। इसके लिए आपको 20 से 30 साल का टार्गेट सेट करना पड़ेगा। जो बच्ची आज पढ़ेगी उसी आगे वाली जेनरेशन उसका रिजल्ट होगी। तो 40 साल बाद यापको ये मालूम होगा कि हमने क्या खोया और क्या पाया।
मुझे अगर मौका मिलेगा तो मुस्लिम कम्यूनिटी ही नहीं बल्की सबके लिए एजुकेशन, प्राइमरी हेल्थ और समाज में आजादी के नाम पर जो नंगापन फैलाया जा रहा है जिससे हमारी नसल की नसल बर्बाद हो रही है उसको ठीक करने के लिए बोलूंगा। औरतों को बराबरी मिलनी चाहिए लेकिन कपड़े उतारने से बराबरी नहीं मिलती एटीट्यूड बदलने से बराबरी मिलती है। औरत को बाजार में खड़ा कर दिया और घर में उसके साथ वही ढंग है दहेज का भ्रूण हत्या का। ये कैसी आजादी है।
Thursday, April 02, 2009
हिंद - पाक में आतंकवादी हमले--किसका षड़यंत्र
Group Editor Roznama Rashtriya Sahara
भारत और पाकिस्तान आतंकवाद के लिए उपजाऊ ज़मीन साबित हो रहे हैं। इससे पूर्व अफगानिस्तान और इराक आतंकवाद का केन्द्र बन गए थे और पूरी दुन्या में अमेरिका ने आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध करने का प्रण करते हुए यदि उन्हें तबाह न किया होता तो आज भी अफगानिस्तान और इराक आतंकवाद की आग में जल रहे होते। न वहां शान्ति प्रिय सरकारें चल रही होती, न हामिद करजई और नूरुल अलमालिकी जैसे शान्ति प्रिया, देश भक्त, मानवता प्रेमी शासक और नेता इन देशों को मिलते। भला हो अमेरिका का के उसे ११ सितम्बर २००१ को न्यू यार्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी हमले के बाद पूरी दुन्या से आतंकवाद को मिटाने की ज़िम्मेदारी ली वरना खुदा जाने क्या होता?अब आप आशा कर सकते हैं के जिस तरह अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक से आतंकवाद को समाप्त किया उसी तरह भारत और पाकिस्तान से भी आतंकवाद को समाप्त किया जा सकता है। वास्तव में हम भाग्यशाली या दुर्भाग्यशाली कौमें हैं ( दोनों में से जो शब्द आप को उचित लगे) जिन्हें अपने वर्तमान और भविष्य के बारे में स्वयं सोचने की आव्यशकता नहीं है, यह उत्तरदायित्व भी अमेरिका ने स्वीकार कर लिया। यदि हम सोच सकते तो शायद यह अवश्य सोच लेते की क्या कारण है के आतंकवाद या आप्राकृतिक मौत के चलते सबसे अधिक भारत और पाकिस्तान ने अपने नेताओं को खोया है। ३० जनवरी १९४८ को स्वतंत्रता के मसीहा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या से लेकर पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की हत्या तक हमने अपने अनेक राष्ट्रिय नेताओं को खोया है।अगर आतंकवादी हमलों में मरने वाले आम लोगों की बात करें तो यह सूची बहुत लम्बी हो जायेगी। इसी तरह पाकिस्तान ने फांसी के तख्ते पर चढाये जाने वाले जुल्फिकार अली भुट्टो, हवाई दुर्घटना में जनरल जियाउल हक़ और पिछले वर्ष एक आतंकवादी हमले में बेनजीर भुट्टो को खोया है। इस प्रकार पाकिस्तानी जनता की बात करें तो मेरियट होटल पर हुए आत्मघाती हमले से लेकर पुलिस ट्रेनिंग सेंटर पर हुए आतंकवादी हमले तक उन्होंने भी सेंकडों शान्ति प्रिया नागरिकों को खोया है। अगर आतंकवादी हमलों में मारे गए सभी सभी लोगों की बात करें तो बात चाहे भारत की हो या पाकिस्तान की, यह संख्या लाखों से कम नहीं है। हम दोनों ही देश शायद इस बात से संतुष्ट हो जाते हैं के बम धमाका भारत में हो तो निशाना पाकिस्तान को बना दिया जाए और जब बम धमाका पाकिस्तान में हो तो वो इशारा भारत की और कर दे और मीडिया को हर बम धमाके के बाद पहले से ही सुनिश्चित किए गए आतंकवादी संघटनों के नामों को सामने रखने का अवसर मिल जाए।बम धमाके अगर भारत में होते हैं तो यह ज़िम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन और लश्करे तैय्यबा पर डाली जा सकती है और अगर यह बम धमाके पाकिस्तान में हो तो दोषी ठहराने के लिए अल्काइद और तालिबान का नाम ही काफ़ी है। हम यह कहना नहीं चाहते के यह आतंकवादी संघटन इन हमलों में शामिल नहीं होंगे या इन आतंकवादी संघटनों को संदेह के दायरे से बहार रखा जाए, मगर इस से हटकर भी कुछ सोचने की आव्यशकता है। आख़िर बिन लादेन और अलकायदा के भूत का नाम लेकर कितने देशों को नष्ट करने की ज़मीन तैयार की जायेगी?हम यह क्यूँ नहीं सोचते के भारत और पाकिस्तान की तबाही के पीछे किसी और शक्ति का उद्देश्य भी छुपा हो सकता है? क्या हम अफगानिस्तान और इराक़ की परिस्थितियों को अनदेखा कर दें , इस पर गौर न करें के इन दोनों देशों को किस प्रकार तबाह किया गया, क्या यह सच हमारे सामने नहीं है के ९/११ के बाद आतंकवाद पर नियंत्रण पाने के बहने अफगानिस्तान और इराक़ को तबाह कर दिया गया? अमेरिका द्वारा खुले आम भयानक आतंकवादी हमले किए गए, हजारों लाखों की संख्या में मासूम इंसानों की जानें गयीं जिन में अस्पतालों में इलाज करा रहे रोगी भी थे, मासूम बच्चे और औरतें भी थीं। फिर भी हम अमेरिका को शान्ति का मसीहा मानते हैं। उस ने अफगानिस्तान और इराक़ में अपनी कठपुतली सरकारें बनाकर इराक़ की तेल की दौलत पर कब्ज़ा कर लिया और अफगानिस्तान को परदे के पीछे अपनी गुलामी में ले लिया। हमें लगता है के अब पाकिस्तान की बारी है।जिस प्रकार तालिबान का बहाना लेकर अफगानिस्तान को तबाह किया गया था उसी तरह अब तालिबान का बहाना बना कर पाकिस्तान को तबाह किया जायेगा, क्यूंकि पाकिस्तान परमाणु शक्ति है, अफगानिस्तान और इराक़ से बड़ा और ताकतवर देश है, अतः उसे तबाह करने की योजना भी उससे बड़ी और चतुराईपूर्ण होगी। पाकिस्तान को तबाह करने के लिए उस पर चारों तरफ़ से हमलों की ज़रूरत होगी। पाकिस्तान के अन्दर इतने आतंकवादी हमले होंगे के हर तरफ़ तबाही का दृश्य होगा, सरकार असफल हो जायेगी, आतंकवाद पर नियंत्रण न पाने की स्थिति में एक तरफ़ भारत पर आरोप लगाया जायेगा, दूसरी तरफ़ अमेरिका से सहायता की प्रार्थना की जायेगी।फिर अमेरिका पाकिस्तान में दाखिल होने के बाद वहां के शासकों को यह समझाने में सफल हो जायेगा के तुम्हारे परमाणु शक्ति संस्थान अगर तालिबान के हाथ में आगये तो ज़बरदस्त तबाही होगी। अत: इस की सुरक्षा का उत्तरदायित्व हमारे पास रहने दो। लाचार और मजबूर पाकिस्तानी शासक सद्दाम हुसैन का हाल देख चुके हैं, इस लिए न करने की हिम्मत नहीं कर सकेंगे। परिणाम स्वरुप पाकिस्तान की परमाणु शक्ति अमेरिका की मुट्ठी में होगी। उसके बाद अमेरिका तालिबान को समाप्त करने के नाम पर पाकिस्तान का भी वही हाल करेगा जो अफगानिस्तान और इराक़ का हुआ।भारत और पाकिस्तान के बीच समबन्ध इस सीमा तक ख़राब होंगे के भारत को पाकिस्तान की तबाही पर कोई दुःख नहीं होगा और वो उसे तबाह करने के लिए हर तरह की सहायता देने के लिए भी तैयार हो जायेगा। इसलिए भारतीय नेतृत्व को यह समझा दिया जायेगा के देखो तालिबान का पाकिस्तान पर प्रभुत्व हो चुका है और अब वो भारत से केवल १० किलो मीटर दूर हैं। अगर तालिबान का सर नहीं कुचला गया तो वह पाकिस्तान के बाद भारत को भी आतंकवाद द्वारा तबाह कर देगा। आपको मुंबई में हुए (२६/११) आतंकवादी हमले से सीख लेना चाहिए और आतंकवाद के ख़िलाफ़ इस जंग में हमारे साथ खड़ा होना चाहिए। इसके बाद वही होगा जो इराक़ की तबाही के दौरान हुआ था, जिस तरह अमेरिका ने इराक़ को तबाह करने के लिए पाकिस्तान की धरती का उपयोग किया था, उसी प्रकार पाकिस्तान को तबाह करने के लिए भारत की ज़मीन प्रयोग की जायेगी। इस काम को पूरा करने में अमेरिका का परस्त मीडिया ज़बरदस्त रोल निभाएगा। आम जनता को मानसिक रूप से तैयार करेगा के तालिबानी आतंकवाद से छुटकारा पाने के लिए अमेरिका का साथ देना आवयशक है।पिछले एक महीने में दिखायी जाने वाली खबरें अगर आपके मस्तिष्क से ओझल न हुई हों तो आप को याद होगा के इसी महीने अर्थात मार्च में पाकिस्तान की एक मस्जिद में ठीक जुमे की नमाज़ के बीच आतंकवादी हमला हुआ और उसके बाद अब पाकिस्तान के पुलिस ट्रेनिंग सेंटर पर। इन दोनों आतंकवादी हमलों से पहले ही मीडिया तालिबान के भय से पूरी दुन्या को सूचित करता रहा और उसके बाद वास्तव में यह भय सच के रूप में दिखाई देने लगा।यह बात संदेह से परे क्यूँ है के यह पाकिस्तान और भारत के ख़िलाफ़ सुनियोजित षड़यंत्र है? ११ सितम्बर २००१ के बाद पूरी दुन्या को जिस तरह आतंकवाद का भय दिखाया गया और अफगानिस्तान व इराक़ को तबाह कर दिया गया उसका लाभ आख़िर किसे पहुँचा? किस ने अपनी श्रेष्ठता साबित की? किसे ने अपने आप को शक्तिशाली साबित किया? किसने पेट्रोल की दौलत पर कब्ज़ा किया? किसने अपने हत्यारों को बेचने के लिए ज़मीन तैयार की? फिर कब तक हम इन तथ्यों पर विचार नहीं करेंगे? हमने अपने इसी रोजनामा राष्ट्रीय सहारा में पिछले वर्ष लगभग एक महीने तक पूरे एक पृष्ठ द्वारा "९/११ का सच" सामने रखने के प्रयास किया था। आज भी एक हज़ार से अधिक पृष्ठों पर आधारित यह रिपोर्ट हमारे पास मौजूद हैं।इन्टरनेट द्वारा तथ्यों की तलाश करने वाले आज भी ऐसी असंख्य रिपोर्टों का अध्ययन कर सकते हैं के जिन से साबित होता है के अमेरिका ९/११ बिन लादेन या अलकायदा का कारनामा नहीं बलके सी आई ऐ और मूसाद शक के दायरे में हैं। क्या भारत में इंडियन मुजाहिदीन, लश्करे तैय्यबा और पाकिस्तान में तालिबान और अलकायदा, सी आई ऐ और मूसाद की ही साजिशी टोली है? यह बात कड़वी है मगर सच भी हो सकती है। भारत और पाकिस्तान अगर मिल बैठ कर सोचें तो क्या वह ही एक दूसरे की तबाही पर आमादा है या कोई और इन दोनों को तबाह करने की साजिशें रच रहा है?
Thursday, March 26, 2009
राज़ क्या है इन विषैले भाषणों का?
राज़ क्या है इन विषैले भाषणों का?
Aziz Burney
Group Editor Roznama Rashtriya Sahara
हिंदुस्तान दुन्या का एक मात्र ऐसा देश है, जहाँ स्पष्ट रूप से हिंदू बहुसंख्यक हैं। देश में लगभग ८० प्रतिशत हिंदू होने के बावजूद देश का प्रधानमंत्री एक सिख (अल्पसंख्यक वर्ग से) देश की सब से शक्तिशाली महिला सत्ताधारी गठबंधन यु पी ऐ की चेयरपरसन श्रीमती सोनिया गाँधी और उन के बाद सब से शक्तिशाली राजनितिक व्यक्तित्व अहमद पटेल। तीनों का ही सम्बन्ध देश के विभिन्न अल्पसंख्यक वर्गों से। कुछ दिन पहले तक देश के राष्ट्रपति ऐ पी जे अबदुलकलाम भी अल्पसंख्यक वर्ग से सम्बन्ध रखते थे और आज देश के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी साहब का सम्बन्ध भी अल्पसंख्यक वर्ग से है। ऐसा अनोखा उदहारण विश्व के किसी अन्य देश से नहीं मिल सकता। यह इस देश की लोकतंत्र में आस्था और सांप्रदायिक सोहार्द का सब से बड़ा उदहारण है। यदि किसी राजनितिक दल को यह ग़लतफहमी है की वो हिंदुस्तान के सभी हिन्दुओं या हिन्दुओं की बहुसंख्या की प्रतिनिधित्व करता है तो यह भ्रम है। यदि इस देश का हिंदू नहीं चाहता तो राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति जैसे पदों पर किसी मुस्लमान की नियुक्ति उन्हें सहन नहीं होती। न वो एक सिख का प्रधानमंत्री बनना स्वीकार करते और न ही एक ईसाई महिला का देश का सब से बड़ा शक्तिशाली व्यक्तित्व बन पाना सम्भव हो पता।
क्या भारतीय जनता पार्टी और उस के संकेत पर चुनावी सभाओं में विषैले भाषण देने वाले बताएँगे की पिछले लगभग पाँच वर्षों में कितने हिंदू संघटनों ने इस बात पर आपत्ति की है के यह प्रमुख पद अल्पसंख्यकों के पास न हों। देश चलाने का उत्तरदायित्व ऐसे लोगों को न सोंपा जाए जिसका सम्बन्ध बहुसंख्यक वर्ग से न हो। क्या कोई धरना प्रदर्शन, विरोध, जलसा,जुलूस,रैली इस मुद्दे को लेकर आयोजित किया गया? यदि नहीं तो अब चुनाव का समय आते ही भारतीय जनता पार्टी को राम मन्दिर और हिन्दुओं की याद क्यूँ आगई? अपनी राजनीति और महत्त्वकांक्षा के लिए १८ वर्ष तक श्री राम के नाम का प्रयोग करने के बाद भी क्या अपना चेहरा उन्हें आईने में दिखाई नहीं देता। मासूम हिन्दुओं को कारसेवा के नाम पर साम्प्रदायिक दंगों की भेंट चढा देना, हिंदू और मुसलमानों को लड़ा देश को घृणा की आग में झोंक देना क्या हिंदूवादी होने का तर्क करार दिया जा सकता है? क्या इसे हिन्दुओं से प्रेम और उन के अधिकारों की सुरक्षा की प्रक्रिया करार दी जा सकती है?
नहीं, बिल्कुल नहीं, कौन देशवासी हिंदू इस बात को स्वीकार करेगा के स्वतंत्रता के मसीहा मोहनदास करमचंद गाँधी की हत्या करने वाला नाथू राम गोडसे हिन्दुओं का प्रतिनिधि था, हिन्दुओं के अधिकारों की सुरक्षा की भावना रखता था, हिंदूवादी था, हिन्दुओं का मित्र था, नहीं! वह मानवता का शत्रु था, भारतीयता का शत्रु था, देश की स्वतंत्रता का शत्रु था, मुसलमानों का ही नहीं हिन्दुओं का भी शत्रु था और ऐसे शत्रु हैं वह सब जो नाथू राम गोडसे जैसी मानसिकता रखते हैं। यदि कुछ लोगों को वरुण गाँधी, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, योगी आदित्यनाथ और साध्वी प्राची जैसे लोगों में नाथूराम गोडसे की छवि दिखाई देती है तो उन्हें इस देश और इस देश के निवसियों का मित्र या हमदर्द स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हमने नहीं लिखा वरुण गांधी के चुनावी सभाओं में दिए गए विषैले भाषण पर, हमने नहीं लिखा साध्वी प्राची के अनुत्तार्दायित्व्पूर्ण (गैरजिम्मेदाराना) भाषण पर, हम नहीं लिखते आज भी इस विषय पर, इसलिए की इन भडकाव बातों का उल्लेख घृणा में बढोतरी करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करेगा।
परन्तु लिखना पड़ा क्यूंकि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने चुनाव आयोग के एक उचित सुझाव को मानने से इंकार कर दिया। इसे विचार करने योग्य भी नहीं समझा। वरुण गाँधी की उमीदवारी या चुनावी मुहीम से हटाना तो दूर, उनका उत्साहवर्धन किया जाने लगा। हर क्षेत्र में वरुण गाँधी की मांग है, यह ढिंढोरा पीटा जाने लगा।
क्या वरुण गाँधी का यह कहना ठीक था की सभी हिन्दुओं को एक पंक्ति में खड़े हो जाना चाहिए और बाकी लोगों को पाकिस्तान भेज देना चाहिए। हमने बार बार अपने लेखों में अपने भाषणों में इस एतिहासिक सच को सामने रखा है की देश के विभाजन के लिए मुस्लमान नहीं इस देश की राजनीती जिम्मेदार है।
१४ अगस्त १९४७ को देश नहीं बंटा बलके मुसलमानों को बांटने का षड़यंत्र रचा गया था और उसके बाद देश के विभाजन के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार करार देने का प्रचार इसलिए किया गया की वह हीन भावना का शिकार रहें, स्वयं को अपराधी समझें और उन्हें दूसरी श्रेणी का नागरिक बना कर पेश किया जाए और यही बात आज वरुण गाँधी कह रहे हैं जो उस समय की सम्प्रदयिम मानसिकता की सोच थी तथा देश के विभाजन की नींव बनी।
क्या भारतीय जनता पार्टी एक सोची समझी योजना के तहत वरुण गाँधी का चेहरा सामने रख कर देश के एक और विभाजन की नींव डाल रही है? क्या वह अपने देश विरोधी षड्यंत्रों को इतिहास के पन्नों में इस प्रकार दर्ज करना चाहते हैं की १९४७ में जब देश बंटा, तब भी नेहरू परिवार जिम्मेदार था और १९४७ के पशचात जब देश बंटा; तब भी नेहरू परिवार का ही एक सदस्य जिम्मेदार था। अन्तर यह है के पहला विभाजन पंडित जवाहर लाल नेहरू के दौर में हुआ या पहले विभाजन का कारण पंडित जवाहरलाल नेहरू बने और उसके पशचात विभाजन का कारण वरुण गाँधी बने।
वरुण गाँधी का सम्बन्ध जिस परिवार से है, उस परिवार ने इस देश की जनता और इस देश की सुरक्षा के लिए अपना खून बहाया है। अपने प्राणों की आहुति दी है। इस परिवार से यदि आज कोई रक्तपात की बात कर रहा है तो उसे न तो अनदेखा किया जा सकता है, न उसे हलके तौर पर लिया जा सकता है। देश की सम्पूर्ण जनता के बिना धर्म व जाती के भेदभाव के बिना मिल बैठ कर यह सोचना होगा के कौन है वह जो वरुण गांधी की यह मानसिकता बना रहे हैं?
जिस नवयुवक का सम्बन्ध एक शांतिप्रिय परिवार से हो, उसे क्यूँ आतंकवादी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है? किसी के हाथ काट डालने की बात कराकर उस की कौनसी छवि पेश की जा रही है? क्या करीमुल्लाह, मज्हरुल्लाह जैसे नामों को वरुण गाँधी की ज़बान से कहलवाकर उस की छवि एक मुस्लिम विरोधी के तरह पेश करना एक षड़यंत्र नहीं है? क्या वरुण गाँधी द्वारा सिखों का मजाक उड़ना, उनको पागल कहलवाना, देश के प्रधानमंत्री और एक विशेष वर्ग का अपमान नहीं है?
वरुण गाँधी एक नवयुवक हैं। राजनीती के मैदान में उन का यह पहला कदम है, नया खून, नया जोश, नई उमंगें, शायद उन्हें इतना समय ही न मिला हो के इन बातों पर गहराई से विचार कर सकें, इन चालों को समझ सकें, जान सकें के यह शातिर मानसिकता के राजनीतिग्य उन्हें एक खतरनाक हथ्यार के रूप में प्रयोग कर परदे के पीछे लाभ उठाना चाहते हैं, क्या वरुण गाँधी नहीं जानते के उनकी माँ का सम्बन्ध किस समुदाय से है ? क्या वरुण गाँधी नहीं जानते के उन के दादा का नाम फिरोज़ गांधी था? यदि हम यह कहें के वरुण गाँधी तुम वह हो, जिसकी शिराओं में एक पारसी का खून भी है। तुम तो सांप्रदायिक सोहार्द का जीता जागता उदहारण हो, तुम्हें देख कर तो हिंदुस्तान के बहुसंख्यक यह कह सकते हैं के हाँ तुम्हारे प्रतिनिधित्व पर गर्व हो सकता है, काश के तुम्हें इसी रूप में पेश किया जाता, परन्तु यह हो न सका।
हम जानते हैं जलन एक विद्रोही मानसिकता बनाने में मुख्य भूमिका अदा करती है और उच्च परिवारों के शत्रु ऐसे नवयुवकों का प्रयोग बहुत आसानी से कर लेते हैं, जो ईर्षा या हीन भावना की आग में जल रहे हों। हो सकता है के यह कहकर भ्रमित किया गया हो की यदि तुम्हारे ही भाई राहुल गांधी को आने वाले कल का प्रधान मंत्री करार दिया जा सकता है तो तुम्हें क्यूँ नहीं और यह काम हम करेंगे, और बस झांसे में एक मासूम मानसिकता इस षड़यंत्र का शिकार हो गई। जिसके चेहरे पर मासूमियत टपकनी चाहिए थी, वह क्यूँ मित्रों को भी शत्रु बनने पर उतारू होगया। वह क्यूँ भाई को भाई से लड़ाने का दाग अपने दामन पर लेने को मजबूर हो गया? सोचना होगा........वरुण गाँधी को भी, उस की माँ को भी और हम सब को भी। यदि हम खामोश रहे तो अपनी राजनीती के लिए सांप्रदायिक मानसिकता रखने वाले यह लोग एक एक करके प्रत्येक परिवार को प्रत्येक नवयुवक को नफरतों की आग में झोंक देंगे। यह देश जहाँ दूध की नदिया बहती थीं, वहां खून की नदिया बहती नज़र आएँगी, जो एकता व शान्ति का प्रतीक था, वहां नफरतों का ज्वालामुखी नज़र आएगा। क्या हम चुनाव जीतने के लिए कुछ लोगों की सत्ता की चाहत पूरी करने के लिए अपने देश को तबाही के गढे में जाते हुए देखते रहेंगे। नहीं, बिल्कुल नहीं, यह ज़िम्मेदारी हम पर भी आती है। हमें केवल वोट नहीं देना है बलके ऐसी विषैली सोच के नेताओं को सबक सिखाना है...........
Wednesday, December 24, 2008
કન્યા કેળવણી અને ઇસ્લામ
કન્યા કેળવણી અને ઇસ્લામ
ઇસ્લામ ધર્મનો આધાર જ ઇલમ અને અમલ પર છે, અર્થાત ઇલ્મ પ્રાપ્ત કરો અને તે પ્રમાણે અમલ કરો. ઇસ્લામી માન્યતા અનુસાર અલ્લાહ તઆલાએ જયારે માનવ વિશ્વ સર્જવાનો નિર્ણય કર્યો તો પ્રથમ માનવી આદમ અલૈ..નું સર્જન કર્યુ પછી અલલાહ તઆલાએ ફરિશ્તાઓ ઉપર માનવીની શ્રેષ્ઠતા બતાવવા માટે આદમ અલૈ.ને ઇલ્મ અને જ્ઞાન આપ્યુ.
આમ ઇલમથી જ સફર શરુ કરવાની માન્યતા ધરાવનાર ધર્મ કે એના અનુયાયીઓ ઇલમના વિરોધી હોય, અથવા સંકુચિત માનસ ધરાવતા હોય એ શકય જ નથી. ઇસ્લામી ઇતિહાસ જોતાં સ્પષ્ટ થાય છે કે. મુસલમાનોએ યથાશકિત ઇલ્મ અને જ્ઞાનની સેવામાં કદી પાછું વળીને નથી જોયુ, કમનસીબે દુનિયા ઉપર બ્રિટન, ફ્રાન્સ અને અન્ય યુરોપીય સત્તાઓએ જયારે કબજો જમાવ્યો તો તેમણે તાબા હેઠળના દરેક દેશના જ્ઞાનના ગળે ટૂપો દઇ દીધો.
આજે જયારે કે ઇસ્લામી વિશ્વ આર્થિક રીતે કઇક સધ્ધર થયું છે, તો આપણે જોઇએ છીએ કે જ્ઞાન અને ઇલ્મની સેવા માટે પૂરતા પ્રયત્નો કરવામાં આવી રહયા છે, ભારતની વાત કરીએ તો આઝાદી વખતે ભાગલાના ભાર વેઠીને બેવડ વળી ગયેલા અને એકલા પડી ગયેલા મુસલમાનોને જો ૫૦ વરસ સીધા થતાં લાગ્યા હોય એન આજે તેઓ જાગૃત થયા છે તો ઘણું વહેલું કહેવાય , આવી રીતે તુટયા પછી, અને હરિફાઇ નહી, અદેખાઇનો સામનો કરીને આટલા વહેલા ટટ્ટાર થવા માટે મુસલમાનોનો હોસલો દાદ માંગી લે છે,
આપણે હવે કન્યા કેળવણીની વાત કરીએ.
શિક્ષણ અને ફેળવણી બાબત ઇસ્લામમાં સ્ત્રી અને પુરુષ વચ્ચે કોઇ ભેદભાવ રાખવામાં આવ્યો નથી.
કુર્આન અને હદીષમાં અલ્લાહ અને તેના રસુલ પયગમ્બર સાહેબના અદેશોમાં આવા તફાવતને કોઇ સ્થાન નથી.
ઉલટાનું સ્ત્રીઓને શિક્ષણ અને કેળવણી આપવા ઉપર ભાર મુકવામાં આવ્યો છે. એટલે જ ઇતિહાસ દ્વારા આપણને જાણવા મળે છે, કે મુસ્લિમ સ્ત્રીઓએ ઇલ્મ પ્રાપ્તિમાં કોઇ પાછીપાની નથી કરી.
પયગમ્બર સાહેબ અલૈ.નું ફરમાન છે કે જે કોઇ માણસની ત્રણ કે બે પુત્રી હોય અને તે તેણીઓનું સારું ઘડતર કરે અને તેઓના બાબત અલ્લાહ તઆલાથી ડરતો રહે તો તેના માટે જન્નત છે.
અન્ય એક કથનમાં પયગમ્બર સલ. ફરમાવે છે, કે જે કોઇ માણસની એક પુત્રી હોય, અને તે તેણીનું યોગ્ય ઘડતર કરે, સારા સંસ્કારો શીખવાડે, સારું શિક્ષણ આપે, અલ્લાહ તઆલાએ આપેલ નેઅમતોથી એની પરવરિશ કરે, તો આ બેટી તેને જહન્નમ–નર્કથી બચવા માટે આડ બની જશે.
બુખારી શરીફમાં પયગમ્બર સલ.ના એક કથન- હદીષ નો ઉલ્લેખ છે તેમા તો માણસને તેની ગુલામડીઓ અને નોકરાણીઓને પણ શિક્ષણ આપ્વાનુ પરોત્સાહન આપવામાં આવ્યુ છે.
પયગમ્બર સલ. ના પવિત્ર પત્નિ હઝરત આઇશા રદી. મદીનાની સ્ત્રીઓના વખાણ કરતા હતા, એટલા માટે કે મદીનાની સ્ત્રીઓ દીન શીખવા સદા તત્પર રહેતી હતી, અને શર્મના કારણે પુરુષોથી પાછળ ન રહેતી હતી.
પયગમ્બર સલ્લલ્લાહુ અલૈહિ વ સલ્લમ પણ સ્ત્રીઓના શિક્ષણ બાબત સદા તત્પર અને ઉત્સાહી રહેતા. સામાન્ય સજોગોમાં અને અવસરો ઉપરાંત એક નકકી દિવસ વિશેષ રૂપે સ્ત્રીઓ માટે નકકી કર્યો હતો, જેમા તેણીઓને પયગમ્બર સાહેબ સલ. શિક્ષણ આપતા અને ધર્મની વાતો શીખવાડતા.
એટલે જ આપણે જોઇએ છીએ કે પયગમ્બર સાહેબ સલ.ના સમયકાળથી જ સ્ત્રીઓએ ઇલ્મની દુનિયામાં તેમનું સ્થાન પાકું કરી લીધું હતું. આપ સલ્લલ્લાહુ અલૈહિ વ સલ્લમ ના સમયે મકકામા લખતા વાચનાર માણસોની સખ્યા ગણીને ૧૩ અથવા ૩૦ હતી, પરંતુ આપ સલ્લલ્લાહુ અલૈહિ વ સલ્લમના પોત્સાહન અને તાકીદના કારણે થોડા જ સમયમા એટલા બધા મુસલમાનો લખતાં વાચતાં શીખી ગયા કે. અલ્લાહના અદેશો એટલે કે કુર્આન અને પયગમ્બર સાહેબના કથનો એટલે હદીષો તેઓ કાગળ, ચામડા કે અન્ય વસ્તુઓ ઉપર લખી લેતા હતા.
પયગમ્બર સાહેબના પત્નિ હઝરત હફસા રદી. એ અન્ય એક સ્ત્રી પાસેથી લખતાં વાંચતાં શીખ્યું હતું, અન્ય એક પત્નિ હઝરત સફિય્યહ પકવાનમાં બે મિસાલ હતાં, ઇબ્ને મસ્ઉદના પત્નિ તેમની કારીગીરીથી પોતાનું અને ફુલ ટાઇમ શિક્ષણમાં વ્યસ્ત એમના પતિનું પણ ભરણપોષણ કમાઇ લેતા. હઝરત આઇશા રદી. સારવાર અને ઇલાજમાં નિપુણ હતા, તેઓ પોતે કહે છે કે પયગમ્બર સાહેબ બિમાર પડતા તો અરબસ્તાનના મોટા મોટા તબીબો સારવાર માટે આવતા, અને તેણી તેઓના બતાવેલ નુસ્ખા યાદ કરી લેતાં. ઉમ્મે વરકહ અને અન્ય સ્ત્રીઓએ આખુ કુર્આન હિફઝ કરી લીધું હતું.
બાદના સમયમા આ સિલસિલો ચાલુ જ રહયો, એક હઝાર વરસોની યાદી હમણા આપવી શકય પણ નથી, થોડા વરસો પૂર્વે મુંબઇમાં જેમનુ અવસાન થયુ એ જનાબ કાઝી અત્હર મુબારકપુરી સાહેબે એક પુસ્તક લખ્યુ છે, ‘ખવાતીને ઇસ્લામકી દીની ઇલ્મી ખીદમાત‘ તેમાં એમણે જ્ઞાનના વિવિધ ક્ષેત્રોમાં નામના પેદા કરનાર હઝારો સ્ત્રીઓનો ઉલ્લેખ કર્યો છે, શકય હોય તો દરેકે આ પુસ્તકનો અભ્યાસ કરવો જોઇએ.
આમ ઇસ્લામી તાલીમ અને આદર્શો અનુસાર સ્ત્રી કેળવણી અને શિક્ષણ બાબતે કોઇ બાંધ નથી એટલુ જ નહિ , એ ધાર્મિક રીતે આવશ્યક , આવકાર્ય અને સરાહનીય કાર્ય છે એ સ્પષ્ટ છે.
આનુ એક સ્પષ્ટ ઉદાહરણ આ પણ છે કે આજકાલ મુસલમાનો દ્વારા બાળકો માટેના મદરેસાઓ ચલાવવામાં આવે છે એ જ પમાણે બાળકીઓ માટેના પણ વિશેષ મદરસાઓ ચલાવવામાં આવી રહયા છે. આ જ પરિસ્થિતિ સ્કૂલો અને અન્ય તાલીમી સસ્થાઓની છે.
અત્રે હું બે ત્રણ સ્પષ્ટતાઓ કરવાનો મોહ પણ રોકી શકતો નથી.
(૧) જ્ઞાન-ઇલ્મનો મુળ ઉદેશ ઇસ્લામની નજરે જોબ, સર્વિસ, નોકરી ચાકરી નથી. ન જ તો જ્ઞાનનો અાશય પૈસા કમાવો કે રોજગાર મેળવવાનો છે, ઇલ્મ અને જ્ઞાનની મહામૂલી દોલતને આવા નાનકડા મકસદ માટે પ્રાપ્ત કરવું પુરુષ માટે પણ શોભનીય નથી, તો સ્ત્રી માટે તો કેમ કરી હોય શકે ? સ્ત્રીની આવી દરેક જરૂરતોનો ભાર ઇસ્લામ દ્વારા તેના પિતા ઉપર નાખ્યો છે માટે સર્વિસ, જોબ કે રોજગારની નિય્યતે ઇલ્મ શીખવું કોઇ સરાહનીય કાર્ય ન કહેવાય.
એટલે જ આ બાબતને ઇસ્લામની વિશિષ્ટતા કહી શકાય કે એણે સ્પષ્ટ રૂપે કહયું છે કે સ્ત્રીનું અસલ કાર્યક્ષેત્ર ઘર છે, તે ચિરાગે ખાના છે, શમ્એ મહેફિલ નથી, જરુરત પમાણે ઘર બહાર નીકળવા, કમાવા અને કર્તવ્ય નિભાવ્વાની પણ છુટ છે.
બીજી વાત એ છે કે ફકત જોહેર જીવનમાં કાર્યરત સ્ત્રીઓને જોઇને પણ મુસ્લિમ સ્ત્રીના શિક્ષણ કે અભણતા વિશે કોઇ મંતવ્ય બાંધવુ ખોટો આધાર કહેવાશે.
અમને તો સમગ્ર મુસ્લિમ વસતી બાબતે શિક્ષ્િાત કે અશિક્ષ્િાત હોવાની જે ઓછી ટકાવારી દર્શાવવામા આવે છે એ બાબતે વાંધો છે એટલે કે શિક્ષ્િાત કે અશિક્ષ્િાત હોવાની ગણતરી માટેનો કોઇ નકકી માપદંડ રાષ્ટીય સ્ત્રે જ નકકી નથી.
આ એક બીજો વિષય છે હમણા એની ચર્ચા અસ્થાને છે

